भारत में स्वास्थ्य सामग्री/ सुविधाओं और दवाइयों तक लोगों की पहुंच
भारत को अक्सर उभरती हुई महाशक्ति कहा जाता है। तकनीक, अंतरिक्ष विज्ञान और डिजिटल क्रांति के क्षेत्र में हमने बड़ी उपलब्धियाँ हासिल की हैं, लेकिन जब बात आम नागरिक के स्वास्थ्य की आती है, तो तस्वीर उतनी चमकदार नहीं प्रतीत होती। आज भी भारत के बड़े हिस्से में स्वास्थ्य सेवाएँ बुनियादी समस्याओं से जूझ रही हैं, जिनमें सबसे आम है स्वास्थ्य सामग्री/ सुविधाओं और आवश्यक दवाइयों की पहुंच व सर्वजन तक उपलब्धता में कमी।
ग्रामीण भारत की बात करें तो स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है। देश की लगभग 65% आबादी गाँवों में रहती है, लेकिन वहाँ मौजूद प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में अक्सर मूलभूत सुविधाओं की भी कमी देखी गयी है। कई जगहों पर एक्स-रे मशीनें खराब पड़ी हैं, कहीं अल्ट्रासाउंड उपलब्ध नहीं है, तो कहीं ब्लड टेस्ट तक की सुविधा नहीं। डॉक्टर चाहकर भी मरीज का सही इलाज नहीं कर पाते क्योंकि उनके पास ज़रूरी उपकरणों की कमी होती है।
ऐसा लगता है कि दवाइयों की कमी एक और गंभीर समस्या है। सरकारी अस्पतालों में मिलने वाली मुफ्त दवाइयाँ अक्सर सीमित होती हैं और कई बार महीनों तक स्टॉक नहीं आता। मरीजों को बाहर से महंगी दवाइयाँ खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है। एक गरीब परिवार के लिए यह किसी सज़ा से कम नहीं होता। कई बार लोग इलाज बीच में ही छोड़ देते हैं, क्योंकि वे दवा का खर्च नहीं उठा पाते।
शहरी क्षेत्रों में भले ही बड़े अस्पताल और निजी स्वास्थ्य संस्थान मौजूद हों, लेकिन वहाँ भी हर व्यक्ति को समान इलाज नहीं मिल पाता। निजी अस्पतालों में आधुनिक उपकरण तो होते हैं, लेकिन उनकी फीस आम आदमी की पहुँच से बाहर होती है। सरकारी अस्पतालों पर मरीजों का बोझ इतना अधिक है कि वहाँ उपकरण होने के बावजूद उनका सही उपयोग नहीं हो पाता। एक-एक मशीन पर सैकड़ों मरीज निर्भर होते हैं, जिससे लंबी कतारें और देरी आम बात लगने लगती है।
कोविड-19 महामारी ने इस व्यवस्था की कमजोरियों को पूरी तरह उजागर कर दिया। ऑक्सीजन सिलेंडर, वेंटिलेटर, आईसीयू बेड और जरूरी दवाइयों की कमी ने हजारों जिंदगियों को खतरे में डाल दिया। उस समय यह लगा कि हमारी स्वास्थ्य प्रणाली किसी बड़े संकट के लिए तैयार नहीं थी। हालाँकि बाद में सुधार की कोशिशें हुईं, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात आज भी बहुत अलग नहीं हैं।
एक बड़ी समस्या यह भी है कि स्वास्थ्य बजट जरूरत के मुकाबले कम प्रतीत होता है। ऐसा लगता है कि भारत अपने बजट का बहुत ही छोटा हिस्सा स्वास्थ्य पर खर्च करता है। जब तक निवेश नहीं बढ़ेगा, तब तक न तो नए उपकरण आएंगे और न ही दवाइयों की उपलब्धता सुधरेगी।
स्वास्थ्य कर्मियों की कमी भी इस समस्या से जुड़ी हुई है। कई अस्पतालों में प्रशिक्षित तकनीशियन नहीं होते, जो आधुनिक मशीनों को चला सकें। नतीजा यह होता है कि मशीनें होते हुए भी बेकार पड़ी रहती हैं। यह सिर्फ संसाधनों की नहीं, बल्कि योजना और प्रशिक्षण की भी कमी प्रतीत होती है।
इस समस्या का समाधान आसान नहीं है, लेकिन असंभव भी नहीं। सरकार को स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी होगी, बजट बढ़ाना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि संसाधन सही जगह तक पहुँचें। स्थानीय स्तर पर निगरानी व्यवस्था मजबूत करनी होगी ताकि उपकरण और दवाइयाँ सही तरीके से इस्तेमाल हों। साथ ही, निजी और सरकारी क्षेत्र के बीच बेहतर सहयोग की भी जरूरत है।
आखिरकार, स्वास्थ्य कोई सुविधा नहीं बल्कि हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। अतः डी टी जी फाउंडेशन का संकल्प इसी अधूरेपन और कमियों के गड्ढों को भरने का है और हम इसके लिए निरंतर प्रयासरत हैं क्यूंकि जब तक देश का आखिरी व्यक्ति सही इलाज नहीं पा सकता, तब तक विकास अधूरा ही है, भारत को अगर सच में एक मजबूत राष्ट्र बनना है, तो उसे अपनी स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोर कड़ियों को पहचानकर उन्हें सुधारना ही होगा।
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