विनयस्य मूलं वृद्धोपसेवा
बुजुर्ग हमारी पिछली पीढ़ी हैं, हमारे इस समाज रुपी पेड़ कि जड़ हैं। हम भले कितने ही आधुनिक और नयी दुनिया बना लें पर बुजुर्ग तब भी हमारी नींव हैं, आज की पीढ़ी के लिये प्रमुख चुनौतियों में से एक है हमारे बुजुर्गो को सहेज कर रखना और उनके साथ सामंजस्य बना कर उन्हें एक आरामदायक या कम से कम एक कष्ट-रहित जीवन देना है।
DTG Foundation समाज के इस नींव को मजबूत बनाए रखने के लिए अपने initiative "सहेज" के माध्यम से योगदान दे रहा है, क्यूंकि जब हम अपने बुज़ुर्गों को सम्मान और सुरक्षा देंगे, तभी एक संतुलित और मानवीय समाज का निर्माण हो सकेगा। नयी पीढ़ी में विनम्रता और प्रेम का बीज केवल वृद्धों कि सेवा से ही आ सकता है, जैसा कि शास्त्रों में भी कहा गया है "विनयस्य मूलं वृद्धोपसेवा"
समय बदल गया है। परिवार छोटे हो गए हैं, ज़िंदगी तेज़ हो गई है और रिश्तों में दूरी बढ़ती जा रही है। नौकरी और बेहतर भविष्य की तलाश में युवा शहरों और देशों से बाहर जा रहे हैं। ऐसे में कई बुज़ुर्ग अपने ही घरों में अकेले रह जाते हैं। दिनभर कोई बात करने वाला नहीं, कोई पूछने वाला नहीं। यह अकेलापन धीरे-धीरे उनके मन और शरीर—दोनों को कमजोर कर देता है।
आर्थिक परेशानी भी बुज़ुर्गों की ज़िंदगी को कठिन बना रही है। बहुत से बुज़ुर्गों ने पूरी उम्र मेहनत की, लेकिन असंगठित क्षेत्र में काम करने के कारण उनके पास पेंशन या बचत नहीं है। बढ़ती महँगाई और इलाज का खर्च उन्हें अंदर ही अंदर तोड़ देता है। कई बुज़ुर्ग अपनी ज़रूरतें इसलिए भी नहीं बताते, क्योंकि वे किसी पर बोझ नहीं बनना चाहते।
स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएँ उम्र के साथ स्वाभाविक हैं, लेकिन सही देखभाल और समय पर इलाज न मिल पाने से हालात और बिगड़ जाते हैं। सिर्फ़ शारीरिक बीमारी ही नहीं, मानसिक तनाव और भावनात्मक थकान भी बुज़ुर्गों के जीवन का हिस्सा बन चुकी है। अफ़सोस की बात यह है कि भारत में मानसिक स्वास्थ्य को आज भी गंभीरता से नहीं लिया जाता।
इसके साथ ही, सम्मान की कमी एक ऐसी पीड़ा है, जो दिखाई नहीं देती लेकिन बहुत गहरी होती है। कई बुज़ुर्गों की राय को “पुराना ज़माना” कहकर टाल दिया जाता है। घर के फैसलों में उनकी बात नहीं सुनी जाती। धीरे-धीरे वे खुद को बेकार समझने लगते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि उनके अनुभव अनमोल होते हैं।
DTG Foundation इन्हीं सच्चाइयों को समझते हुए बुज़ुर्गों के लिए काम कर रहा है। हमारा उद्देश्य सिर्फ़ मदद करना नहीं, बल्कि बुज़ुर्गों को यह एहसास दिलाना है कि वे आज भी महत्वपूर्ण हैं। हम चाहते हैं कि वे सुरक्षित महसूस करें, सम्मान के साथ जिएँ और अपने जीवन के इस पड़ाव में भी मुस्कुरा सकें।
हम बुज़ुर्गों के लिए सहयोग, संवाद और जागरूकता के ज़रिए एक ऐसा वातावरण बनाने का प्रयास कर रहे हैं जहाँ वे अकेले न महसूस करें। हमारा मानना है कि बुज़ुर्ग समाज का बोझ नहीं, बल्कि उसकी जड़ हैं। जब जड़ें मज़बूत होती हैं, तभी पूरा समाज मज़बूत बनता है।
DTG Foundation का संकल्प है कि हर बुज़ुर्ग को एक सम्मानजनक, सुरक्षित और खुशहाल जीवन मिले। क्योंकि जिस समाज में बुज़ुर्गों की कद्र होती है, वही समाज वास्तव में आगे बढ़ता है।
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